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गीता ज्ञान का आध्यात्मिक रहस्य – तीन प्रकार के दान

दान देना एक कर्त्तव्य माना गया है समाज में ,जो दान योग्य स्थान और समय देखकर , योग्य पात्र को दिया जाता है , जिसमें प्रति उपकार की अपेक्षा नहीं होती वह दान सात्विक माना जाता है ।

दान करके उसके साथ भी हम एक ज्वाइंट एकाऊंट क्रियेट कर लेते हैं तो उसका किया गया पाप हमें भी पाप के भाग में खींच ले जाता है । जो दान क्लेश पूर्वक तथा प्रति उपकार के उद्देश्य से और फल की कामना रखकर दिया जाता है । वह दान राजस अर्थात् राजसिक दान है ।

जहाँ प्राप्ति की इच्छा है , जो दान बिना सत्कार किये , तिरस्कार पूर्वक , अपवित्र स्थान , अनुचित समय में कुपात् को दिया जाता है , वह दान तामस अर्थात् तामसिक दान माना गया है ।

आज एक व्यक्त्ति गरीब है , उसकी स्थिति को देखते हुए हमें दया आती है और हमने उसको बीस या पचास रूपये दे दिये । सोचा चलो मेरा तो पुण्य जमा हो गया । मैने तो दान कर दिया ना । लेकिन ज़रूरी नहीं है कि उससे पुण्य का खाता ही जमा हुआ । वो निर्भर इस बात पर करता है कि वो व्यक्त्ति इन पैसों का इस्तेमाल किस तरह करता है । माना उस पैसों से , उसनें एक चाकू खरीदा और चाकू से किसी का खून कर दिया । तो उसने जो पापकर्म किया , उस पापकर्म के भागीदार हम भी बन गए । क्योंकि मैने दिया तब उसने किया । अगर मैं नहीं देता तो शायद वह करता भी नहीं । इसलिए उसने जो पापकर्म किया उसके भागीदार हम बन गए ।

इस प्रकार कलियुग में जाने -अनजाने में बहुत पापकर्म हो गए हैं । एक तो जानकार होता है कि हमने झूठ बोला , किसी को दुःख दिया तो ये पापकर्म के खाते में चला जाता है । लेकिन जो अनजानेपन के पापकर्म होते हैं , वो इस प्रकार के होते हैं । जहाँ अनुचित समय और कुपात्र को दिया जाता है , तो उस कुपात्र ने जो कर्म किया उसकी भागीदार में , वो पापकर्म में हम भी हिस्सेदार हो जाते हैं । कहा जाता कि कलियुग में पात्र देखकर दान करो , नहीं तो दान न करना ज्यादा अच्छा है । कुपात्र को देकर समाज में और भी कुकर्म को बढ़ावा देने की बजाए अच्छा रहे कि दान न करें ।

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