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मैक्‍स समूह को झटका, लापरवाही से इलाज में भरना होगा 30 लाख

मैक्‍स अस्‍पताल समूह फि‍र चर्चा में है। इस बार दिल्ली राज्य उपभोक्ता आयोग ने दिल्‍ली के पीतमपुरा स्थित मैक्स अस्पताल को 10 साल के बच्चे तथा उसके माता-पिता को 30 लाख रुपये बतौर मुआवजा देने का निर्देश दिया है। ये आदेश इसलिए दिए गया क्‍योंकि अस्पताल में बच्चे के जन्म के समय चिकित्‍सकों की लापरवाही के कारण उसके एक हाथ में स्थायी तौर पर समस्या रह गई थी।क्‍या है मामला दरअसल साल 2007 में हरियाणा के सोनीपत की रहने वाली आरती गर्ग बच्‍चे की डिलिवरी के लिए इस अस्‍पताल में भर्ती हुई थीं। डिलिवरी के दौरान बच्‍चे का सिर तो बाहर आ गया मगर उसका एक हाथ अंदर फंसा रह गया था। माता-पिता का आरोप है कि उस हाथ को चिकित्‍सकों ने लापरवाही से खींच कर बाहर निकाला जिसके कारण उस हाथ में स्‍थाई खराबी आ गई। जन्‍म के कुछ समय बाद माता-पिता को इस समस्‍या का पता चला तो उन्‍होंने इसकी जांच कराई। चिकित्‍सकों ने बताया कि ये शोल्‍डर डिस्‍टोशा नामक समस्‍या है जो कि बच्‍चे के जन्‍म के समय सही से डिलिवरी नहीं करवाने पर होती है। इसके बाद आरती गर्ग और उनके पति ने मैक्‍स अस्‍पताल को लीगल नोटिस भेजते हुए 50 लाख रुपये मुआवजे की मांग की।

अस्‍पताल ने ये मुआवजा देने से साफ मना कर दिया और कहा कि उसकी तरफ से कोई लापरवाही नहीं हुई है और जन्‍म के समय बच्‍चे का हाथ बिल्‍कुल सही था।कंज्‍यूमर कोर्ट में गया मामला इसके बाद गर्ग दंपत्ति मामले को कंज्‍यूमर फोरम में लेकर गए जहां फैसला उनके पक्ष में आया। दिल्ली राज्य उपभोक्ता विवाद निपटान आयोग की पीठ ने निजी अस्पताल पर भारी जुर्माना लगाते हुए कहा कि इससे अस्‍पताल के मानव जाति को सेवा देने के रुख में गुणात्मक बदलाव लाने के मकसद को पूरा किया जा सकता है। आयोग की पीठ ने कहा, ‘मानवीय स्पर्श जरूरी है। यह उनकी आचार संहिता है। यह उनका कर्तव्य है और इसे क्रियान्वित करने की जरूरत है।’ इस 30 लाख रुपये में से 20 लाख रुपये रितेश कुमार गर्ग, आरती गर्ग और उनके बेटे कुश गर्ग को हुई समस्या और मानसिक पीड़ा का मुआवजा है। 5 लाख रुपये बच्चे की मां को अलग से दिया जाएगा। यह राशि बच्चे को जन्म देने के समय अस्पताल में भर्ती होने से लेकर बच्चे के मुंबई के अस्पताल में इलाज में आयी खर्च का मुआवजा होगा। इसके अलावा 5 लाख रुपये मुकदमे में हुए खर्च के बदलने देने को कहा गया।अस्‍पताल ने गलती नहीं मानी हालांकि आशा के अनुरूप ही अस्‍पताल ने फ‍िलहाल ये राशि देने से इनकार कर दिया है और साफ किया है कि वो इस फैसले को राष्‍ट्रीय उपभोक्‍ता अदालत में चुनौती देंगे। यानी गर्ग दंपत्ति की लड़ाई अभी खत्‍म नहीं हुई है।

एक ताकतवर अस्‍पताल समूह के खिलाफ यह लड़ाई उन्‍हें शायद सुप्रीम कोर्ट तक लड़नी पड़े।पहले भी विवादों में रहा है समूह अभी ज्‍यादा दिन नहीं बीते हैं जब मैक्‍स अस्‍पताल समूह के शालीमार बाग स्थित अस्‍पताल का लाइसेंस दिल्‍ली सरकार ने इलाज में लापरवाही बरतने के कारण रद्द कर दिया था। तब उस अस्‍पताल पर आरोप था कि जिंदा बच्‍चे को मरा बताकर उसे मां-बाप को सौंप दिया था। बाद में बच्‍चा जिंदा पाया गया। इस मामले ने काफी तूल पकड़ा तो दिल्‍ली सरकार ने अस्‍पताल का लाइसेंस रद्द करते हुए अस्‍पताल को बंद करने का आदेश जारी किया। हालांकि बाद में अधिकारियों ने तकनीकी वजहों का हवाला देते हुए अस्‍पताल को फ‍िर से खुलवा दिया। इससे पहले मैक्‍स समूह के ही गाजियाबाद के वैशाली स्थित अस्‍पताल में डॉक्‍टरों पर लापरवाही से इलाज का आरोप लगा और इंदिरापुरम थाने में अस्‍पताल के डॉक्‍टर प्रकाश और डॉक्‍टर रजत के खिलाफ लापरवाही से इलाज के कारण अपने पति की मौत होने का आरोप लगाते हुए एक महिला ने गैर इरादतन हत्‍या का मुकदमा दर्ज कराया।

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