Vipassana Meditation : विपस्सना ध्यान विधि by Astrologer Dr Praveen Jain Kochar

Vipassana Meditation by Astrologer Dr Praveen Jain Kochar

विपश्‍यना मनुष्‍य जाति के इतिहास का सर्वाधिक महत्‍वपूर्ण ध्‍यानप्रयोग है। जितने व्‍यक्‍ति विपश्यना से बुद्धत्‍व को उपलब्‍ध हुए उतने किसी और विधि से कभी नहीं। विपश्यना अपूर्व हे। विपश्यना शब्‍द का अर्थ होता है: देखनालौटकर देखना।

      बुद्ध कहते थेइहि पस्‍सिकोआओ और देखो। बुद्ध किसी धारणा का आग्रह नहीं रखते। बुद्ध के मार्ग पर चलने के लिए ईश्‍वर को मानना न मानना,आत्‍मा को मानना न मानना आवश्‍यक नहीं है। बुद्ध का धर्म अकेला धर्म है दुनिया में जिसमें मान्‍यता,पूर्वाग्रहविश्‍वास इत्‍यादि की कोई आवश्‍यकता नहीं है। बुद्ध का धर्म अकेला वैज्ञानिक धर्म है।

      बुद्ध कहते: आओ और देख लो। मानने की जरूरत नहीं है। देखोफिर मान लेना। और जिसने देख लिया उसे मानना थोड़े ही पड़ता है;मान ही लेना पड़ता है। और बुद्ध के देखने की जो प्रकिया थी। दिखाने की जो प्रकिया थी उसका नाम था विपस्सना।

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विपस्सना बड़ा सीधा सरल प्रयोग है। अपनी आती जाती श्‍वास के प्रति साक्षी भाव। श्‍वास जीवन है। श्‍वास से तुम्‍हारी आत्‍मा और तुम्‍हारी देह जूड़ी है। श्‍वास सेतु है। इस पार देह हैउस पार चैतन्‍य है। मध्‍य में श्‍वास है। यदि तुम श्‍वास को ठीक से देखते रहोतो अनिवार्य रूपेण अपरिहार्य रूप से शरीर से तुम भिन्‍न अपने को जानोंगे। श्‍वास को देखने के लिए जरूरी हो जायेगा कि तुम अपनी आत्‍मचेतना में स्‍थिर हो जाओ। बुद्ध कहते नहीं कि आत्‍मा को मानो। लेकिन श्‍वास को देखने का ओर कोई उपाय नहीं है। जो श्‍वास को देखेगा,वह श्‍वास से भिन्‍न हो गया।

और जो श्‍वास से भिन्‍न हो गया। वह शरीर से भी भिन्‍न हो गया। क्‍योंकि शरीर सबसे दूर हैउसके बाद श्‍वास हैउसके बाद तुम हो। अगर तुमने श्‍वास को देखा तो श्‍वास के देखने में शरीर से तो तुम अनिवार्य रूपेण छूट गए। शरीर से छूटोंश्‍वास से छूटोंतो शाश्‍वत का दर्शन होता है। उस दर्शन में ही उड़ान हैऊँचाई हैउसकी ही गहराई है। बाकी न तो कोई ऊँचाइयों है जगत में न कोई गहराइयों है जगत में। बाकी तो व्‍यर्थ की आपाधापी है।

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