Vipassana : विपस्सना ध्यान के अनसुलझे रहस्य by Dr Praveen Jain Kochar

बुद्ध कहते हैतुम अगर चेष्‍टा करके श्‍वास को किसी तरह

नियोजित करोगेतो चेष्‍टा से कभी भी महत फल नहीं होता। चेष्‍टा तुम्‍हारी हैतुम ही छोटे हो;तुम्‍हारे हाथ छोटे है। तुम्‍हारे हाथ की जहांजहां छाप होगीवहांवहां छोटापन होगा।

      इसलिए बुद्ध ने यह नहीं कहा है कि श्‍वास को तुम बदलों। बुद्ध ने प्राणायाम का समर्थन नहीं किया। बुद्ध ने तो कहा3 तुम तो बैठ जाओ,श्‍वास तो चल ही रही है। जैसी चल रही है बस बैठकर देखते रहो। जैसे राह के किनारे बैठकर देखते रहो। जैसे राह के किनारे बैठकर कोई राह चलते यात्रियों को देखेकि नदीतट पर बैठ कर नदी की बहती धार को देखे। तुम क्‍या करोगे?

 

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आई एक बड़ी तरंग तो देखोगें और नहीं आई तरंग तो देखोगें। राह पर निकली कारें बसें तो देखोगेंगाय भैंस निकली तो देखोगें। जो भी है जैसा हैउसको वैसा ही देखते रहो। जरा भी उसे बदलने की आकांशा आरोपित मत करना। शांत बैठ कर श्‍वास को देखते रहो। देखते रहोश्‍वास और शांत हो जाती है। क्‍योंकि देखने में ही शांति है।

      और निर्चुनावबिना चुने देखने में बड़ी शांति है। अपने करने का कोई प्रश्‍न ही नहीं है। जैसा है ठीक है। जैसा है शुभ है। जो भी गुजर रहा है आँख के सामने से हमारा उससे कुछ लेना देना नहीं है। तो उद्विग्‍न होने का कोई सवाल ही नहीं है। आसक्‍त होने की कोई बात नहीं। जो भी विचार गुजर रहे हैनिष्‍पक्ष देख रहे है। श्‍वास की तरंग धीरेधीरे शांत होने लगेगी। श्‍वास भीतर आती हैअनुभव करो फेफड़ों का फैलना। फिर क्षण भर सब रूक जाना….अनुभव करो। उस रुके हुए क्षण को। फिर श्‍वास बाहर चली फेफड़े सुकड़े लगे अनुभव करो उस सुड़कने को फिर नासापुटों से श्‍वास बाहर गयी। अनुभव करो उतप्‍त श्‍वास नासा पुटों से बाहर जाती है। फिर क्षण भर सब ठहर जाता है। फिर नया स्‍वास आयी।

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