
Jagannath Temple Puri: देश में धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत में ओड़िशा के पुरी में स्थित श्री जगन्नाथ मंदिर का खास स्थान होता है। ये मंदिर न सिर्फ हिंदी धर्म के सबसे पवित्र स्थलों में से एक माना जाता है, बल्कि अपनी प्रचानी परंपराओं, रहस्मयी मान्यताओं और विश्व प्रसिद्ध रथ यात्रा ( Jagannath Temple History) की वजह के पूरी दुनिया में फेमस है। हर साल देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु भगवान जगन्नाथ (Who Built Jagannath Temple) के दर्शन के लिए पुरी जाते हैं और दिव्य धाम में शांति का अनुभव करते हैं। बता दें पुरी का श्री जगन्नाथ मंदिर हिंदू धर्म के चार धाम में से एक है। बद्रीनाथ (उत्तर), द्वारका (पश्चिम), रामेश्वरम (दक्षिण) और जगन्नाथ पुरी (पूर्व) को मिलाकर चार धाम की यात्रा पूरी मानी जाती है।
धार्मिक मान्यता के मुताबिक, अगर जीवन में एक बार चार धाम की यात्रा की है तो विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है। इस मंदिर की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यहां भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई भगवान बलभद्र और बहन देवी सुभद्रा की लकड़ी से बनी विशिष्ट मूर्तियों की पूजा की जाती है। इन मूर्तियों का स्वरूप भारत के अन्य मंदिरों में स्थापित पारंपरिक देव प्रतिमाओं से बिल्कुल अलग है और इसी वजह से यह मंदिर दुनिया भर में अपनी अलग पहचान रखता है।
जानें श्री जगन्नाथ मंदिर का इतिहास
बता दें श्री जगन्नाथ मंदिर का इतिहास धार्मिक आस्था, पौराणिक कथाओं और ऐतिहासिक तथ्यों का संगम है। इस मंदिर के स्थापित होने से जुड़ी कई कथाएं हैं, जिनमें सबसे प्रसिद्ध कथा राजा इंद्रद्युम्न और भगवान विश्वकर्मा से जुड़ी है। वहीं इतिहासकार वर्तमान मंदिर का निर्माण गंगा वंश के महान शासक राजा अनंतवर्मन चोडगंगा देव से भी जोड़ते हैं।
जानें क्या है राजा इंद्रद्युम्न की पौराणिक कथा
पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक, मालवा के राजा इंद्रद्युम्न भगवान विष्णु के परम भक्त थे। एक दिन उनको सपने में भगवान ने दर्शन देकर पूर्वी समुद्र तट पर अपने दिव्य स्वरूप की स्थापना करने और एक भव्य मंदिर बनाने का निर्देश दिया। राजा के द्वारा इस आदेश को ईश्वर की इच्छा मानते हुए उस स्थान की खोज शुरू कराई। कई दिनों की कोशिशों के बाद उनको इस समय के पुरी क्षेत्र में भगवान के दिव्य स्वरूप की स्थापना का संकेत भी मिला और यहीं पर मंदिर को बनाने की योजना बनाई गई। धार्मिक मान्यता के मुताबिक भगवान खुद चाहते थे कि उनका यह स्वरूप संसार के कल्याण के लिए स्थापित हो।

जानें भगवान विश्वकर्मा और अधूरी मूर्तियों की कथा
बता दें जगन्नाथ मंदिर की सबसे प्रसिद्ध कथा भगवान विश्वकर्मा से भी जुड़ी हुई है। लोगों की मान्यता है कि भगवान विश्वकर्मा एक वृद्ध बढ़ई का रूप धारण करके राजा इंद्रद्युम्न के पास पहुंचे और उन्होंने भगवान की मूर्तियां बनाने की इच्छा जताई। लेकिन उनके द्वाराएक शर्त रखी गई कि जब तक मूर्तियां तैयार न हो जाएं, तब तक कोई भी शख्स उस कमरे का दरवाजा नहीं खोलेगा।
इसके बाद राजा ने शर्त मान ली। इसके बाद विश्वकर्मा कई दिनों तक बंद कमरे में लगातार मूर्तियों बनाते रहे। कुछ समय बाद अंदर से किसी प्रकार की आवाज आना बंद हो गई। रानी और राजा दोनों चिंतित हुई कि कहीं वृद्ध बढ़ई के साथ कोई अनहोनी तो नहीं हो गई।
आखिर में राजा अपनी उत्सुकता और चिंता को रोक नहीं सके और तय समय पूरा होने से पहले ही कमरे का दरवाजा खुलवा दिया। दरवाजा खुलते ही बूढ़ा बढ़ई वहां से अदृश्य हो गए। धार्मिक मान्यता के मुताबिक वह भगवान विश्वकर्मा थे। कमरे में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा की लकड़ी की मूर्तियां थीं, लेकिन उनके हाथ और पैर पूरी तरह नहीं बन पाएं थे। तभी से इन अधूरे स्वरूपों को ही भगवान का दिव्य रूप मानकर पूजा जाता है।
वर्तमान जगन्नाथ मंदिर का ऐतिहासिक निर्माण
इतिहासकारों का कहना है कि इस समय भव्य श्री जगन्नाथ मंदिर का निर्माण पूर्वी गंगा वंश के महान शासक राजा अनंतवर्मन चोडगंगा देव के द्वारा 12वीं शताब्दी में कराया था। ऐसा माना जाता है कि मंदिर बनने का काम तकरीबन 1135 ईस्वी के आसपास शुरु हुआ और बाद के सालों में इसे पूरा किया गया। काफी इतिहासकार कहते है कि 1150 ईस्वी तक मंदिर का प्रमुख निर्माण पूरा हो चुका था तथा इसके बाद के शासकों ने इसमें समय-समय पर और काम कराया। आज के समय जो विशाल मंदिर दिखाई देता है, वह मध्यकालीन भारतीय स्थापत्य कला का एक उदाहरण है।
कमाल है मंदिर की वास्तुकला
बता दें पुरी का जगन्नाथ मंदिर कलिंग शैली की वास्तुकला का शानदार उदाहरण मानी जाती है। मंदिर परिसर को बड़े पत्थरों से बनाया गया है और इसकी ऊंची शिखर बनावट दूर से ही श्रद्धालुओं को आकर्षित करती है। मंदिर के मुख्य भागों की बात करें तो इसमें गर्भगृह, जगमोहन, नाटमंडप और भोग मंडप विशेष रूप से खास माने जाते हैं।
मंदिर के शिखर पर स्थापित ध्वज और सुदर्शन चक्र श्रद्धालुओं के लिए विशेष आस्था का केंद्र हैं। चार धाम में जगन्नाथ पुरी का स्थान महत्व रखता है। इसके चारों धाम में बद्रीनाथ (उत्तराखंड), द्वारका (गुजरात), रामेश्वरम (तमिलनाडु) जगन्नाथ पुरी (ओडिशा) शामिल हैं। इन चारों धामों की यात्रा को काफी पुण्यदायी माना जाता है। पुरी को पूर्व दिशा का धाम माना जाता है और लाखों श्रद्धालु हर साल यहां दर्शन के लिए जाते हैं।
जानें कौन हैं भगवान जगन्नाथ?
भगवान जगन्नाथ को भगवान विष्णु तथा भगवान श्रीकृष्ण का स्वरूप माना जाता है। बता दें मंदिर में तीन प्रमुख देवताओं भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र, देवी सुभद्रा की पूजा होती है। पुरी में तीनों देवता एक साथ विराजमान हैं, जो भारतीय धार्मिक परंपरा में भाई-बहन के प्रेम और पारिवारिक एकता का प्रतीक माने जाते हैं।

जानें अधूरी मूर्तियों का धार्मिक महत्व
बता दें जगन्नाथ मंदिर की सबसे बड़ी खासियत यहां स्थापित लकड़ी की अधूरी मूर्तियां हैं। ये मूर्तियां हाथ से पूरी तरह से नहीं बनी हैं। पैर भी स्पष्ट रूप से नहीं दिखाई देते। मूर्तियों का चेहरा बेहद विशिष्ट शैली में निर्मित है। बड़ी गोल आंखें इनकी अलग पहचान हैं। इसके साथ धार्मिक मान्यता है कि भगवान किसी एक सीमित रूप में नहीं बंधे हैं और उनका यह स्वरूप उनकी दिव्यता का प्रतीक माना जाता है।
लकड़ी की मूर्तियां क्यों?
बता दें ज्यादातर हिंदू मंदिरों में पत्थर या धातु की मूर्तियां स्थापित होती हैं। लेकिन पुरी में भगवान की मूर्तियां खास प्रकार की पवित्र लकड़ी से बनाई जाती हैं। समय-समय पर एक खास धार्मिक प्रोसेस के तहत नई मूर्तियों का निर्माण किया जाता है, जिसको नवकलेवर परंपरा कहा जाता है। इस अवसर पर गोपनीय और पारंपरिक तरीके से नई मूर्तियां बनाई जाती हैं।
विश्व प्रसिद्ध रथ यात्रा
बता दें पुरी की रथ यात्रा विश्व के सबसे बड़े धार्मिक आयोजनों में से एक मानी जाती है। ये हर साल आषाढ़ मास में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा अपने-अपने विशाल रथों में विराजमान होकर मंदिर से बाहर निकलते हैं। वहीं लाखों श्रद्धालु रस्सियों से इन विशाल रथों को खींचते हैं। इसका आयोजन सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। रथ यात्रा के दौरान पुरी में श्रद्धालुओं का विशाल जनसैलाब उमड़ता है।
क्या है रथ यात्रा का धार्मिक महत्व
ऐसी मान्यता है कि भगवान स्वयं अपने भक्तों के बीच आते हैं। जो लोग किसी कारण मंदिर के गर्भगृह तक नहीं पहुंच पाते, उनको भी रथ यात्रा के दौरान भगवान के दर्शन का मौका मिलता है। इसी वजह से रथ यात्रा को बेहद शुभ और पुण्यदायी माना जाता है।
क्या है जगन्नाथ मंदिर का आध्यात्मिक महत्व
यह मंदिर केवल पूजा का स्थान नहीं है इसके साथ भारतीय संस्कृति, भक्ति का भी प्रतीक माना जाता है। पुरी में आने वाले श्रद्धालु सिर्फ दर्शन ही नहीं करते बल्कि भगवान के महाप्रसाद को भी बेहद पवित्र मानते हैं। मंदिर की परंपराएं सालों से लगभग उसी तरह में चली आ रही हैं और आज भी लाखों लोग इनका पालन कर रहे हैं।
निष्कर्ष
बता दें ओडिशा के पुरी में स्थित श्री जगन्नाथ मंदिर भारत की सबसे धार्मिक धरोहरों में से एक माना है। पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक राजा इंद्रद्युम्न ने भगवान के आदेश पर मंदिर की स्थापनी की थी। वहीं ऐतिहासिक रूप से मौजूदा भव्य मंदिर का निर्माण 12वीं शताब्दी में गंगा वंश के राजा अनंतवर्मन चोडगंगा देव ने कराया था। भगवान विश्वकर्मा के द्वारा अधूरी छोड़ी गई लकड़ी की मूर्तियों की कथा इस मंदिर को और भी खास बनाती है।
