फिटमेंट फैक्टर बना गेमचेंजर! 8वें वेतन आयोग से कितनी बढ़ेगी आपकी सैलरी?

Adarsh P4 min read

8th Pay Commission Salary Hike: सरकारी दफ्तरों में इन दिनों एक ही सवाल सबसे ज्यादा सुनाई दे रहा है—आखिर 8वां वेतन आयोग कब लागू होगा? यह उत्सुकता स्वाभाविक है, क्योंकि करीब 50 लाख से ज्यादा केंद्रीय कर्मचारी और लगभग 69 लाख पेंशनभोगी अपनी सैलरी और पेंशन में सुधार की उम्मीद इसी आयोग से लगाए बैठे हैं।

8वां वेतन आयोग की कमान सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति रंजना प्रकाश देसाई के हाथों में है। आयोग वेतन तय करने से पहले कई अहम बिंदुओं, खासकर फिटमेंट फैक्टर, का विश्लेषण कर रहा है। सरकार ने 28 अक्टूबर 2025 को आयोग के टर्म्स ऑफ रेफरेंस (ToR) जारी किए थे और रिपोर्ट सौंपने के लिए 18 महीने की समयसीमा तय की है।

फिटमेंट फैक्टर क्यों है अहम?

8वें वेतन बढ़ोतरी में सबसे बड़ी भूमिका फिटमेंट फैक्टर निभाता है। इसे एक गुणक की तरह समझें—मौजूदा बेसिक पे को इसी संख्या से गुणा करके नया वेतन तय किया जाता है। आसान शब्दों में कहें तो यही तय करता है कि सैलरी में सामान्य बढ़ोतरी होगी या बड़ा उछाल। 7वें वेतन आयोग में फिटमेंट फैक्टर 2.57 रखा गया था, जिससे कर्मचारियों की सैलरी में औसतन 14 से 16 प्रतिशत तक बढ़ोतरी हुई थी।

8वें वेतन आयोग में कितना हो सकता है फिटमेंट फैक्टर?

मीडिया रिपोर्ट्स और विशेषज्ञों के अनुसार, नया फिटमेंट फैक्टर 1.83 से 3.0 के बीच हो सकता है। हालांकि ज्यादातर अनुमान इसे 2.15 से 2.57 के दायरे में मान रहे हैं। अगर ऐसा होता है तो पे लेवल 1 से 18 तक के कर्मचारियों की सैलरी में करीब 20 से 35 प्रतिशत तक बढ़ोतरी संभव है।

ध्यान देने वाली बात यह है कि इसका असर हर स्तर पर अलग-अलग दिखेगा। अगर एक समान फिटमेंट फैक्टर लागू होता है, तो ऊंचे पदों पर बैठे अधिकारियों को रुपये के हिसाब से ज्यादा फायदा दिखेगा। वहीं निचले स्तर (लेवल 1 से 5) के कर्मचारियों को प्रतिशत के आधार पर अधिक लाभ मिल सकता है।

नेशनल काउंसिल (JCM) के सचिव शिव गोपाल मिश्रा का मानना है कि फिटमेंट फैक्टर कम से कम 2.57 या उससे अधिक होना चाहिए। उनका कहना है कि यह 7वें वेतन आयोग का बेंचमार्क है और इससे कम रखने पर कर्मचारियों को नुकसान हो सकता है।

कब तक लागू हो सकती है नई सैलरी?

आयोग अप्रैल 2027 तक अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप सकता है। लेकिन रिपोर्ट मिलते ही नई सैलरी लागू नहीं होती। पहले वित्त मंत्रालय और अन्य संबंधित विभाग रिपोर्ट की समीक्षा करते हैं, जरूरत पड़ने पर बदलाव किए जाते हैं और फिर इसे कैबिनेट की मंजूरी मिलती है। इस पूरी प्रक्रिया में आमतौर पर करीब छह महीने लग जाते हैं।

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