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Chanakya Niti: यह एक चीज है व्यक्ति की समस्या का जड़, नहीं त्यागा तो होगा बड़ा नुकसान

Chanakya Niti: इंसानों की जिंदगी में कई तरह के उतार चढ़ाव आते हैं। किसी का भी जीवन एक तरह का नहीं होता है। कभी व्यक्ति के जीवन में खुशियों की बरसात होती है।  तो कभी उनकी जिंदगी में दुख के बादल छा जाते हैं।

चाणक्य को देश के सबसे बड़े विद्वानों में से एक माना जाता है।  उन्होने जीने के सलीके को लेकर कई सारी बातें कही है। चाणक्य के अनुसार व्यक्ति के जीवन में सुख और दुख उनके कर्म के अनुसार निर्भर करता है।

चाणक्य ने एक ऐसी चीज का जिक्र किया है जो व्यक्ति की समस्या का जड़ है। आचार्य चाणक्य के अनुसार मनुष्य का भविष्य उनके कर्म के ऊपर में निर्भर करता है।  केवल चाणक्य ही नहीं बल्कि गीता में भी इस बारे में भगवान कृष्ण ने बहुत विस्तार से चर्चा की है। भगवान कृष्ण के अनुसार अच्छी नीति के तहत् किए गए काम का फल जरुर मिलता है।

 

यस्य स्नेहो भयं तस्य स्नेहो दुःखस्य भाजनम् ।

स्नेहमूलानि दुःखानि तानि त्यक्तवा वसेत्सुखम् ।।

मोह है समस्याओं की जड़

 

इस बारे में बात करतें हुए आचार्य चाणक्य कहते हैं कि मोह और लगाव ही सभी समस्याओं का जड़ है। ऐसा माना जाता है कि मोह से अज्ञानता की वृद्धि होती है। इसलिए मोह को त्याग देना चाहिए। मोह के कारण ही अज्ञानता में फंस कर धृतराष्ट्र ने महाभारत को नहीं रोका था। क्योंकि वो पुत्र मोह में समाया हुआ था।

लगाव से भटक जाता है लक्ष्य

मनुष्य जीवन में धन, रिश्ते, वासना आदि किसी भी चीज का अधिक लगाव व्यक्ति को लक्ष्य प्राप्ति के रास्ते से भटका देता है और उसे संघर्ष का सामना करना पड़ता है।  इस बारे में बात करतें हुए गीता में श्री कृष्ण ने कहा है कि जब भी कोई व्यक्ति मोह का त्याग कर देता है तो उसपर कृपा हो जाती है। मोह रहित व्यक्ति परम आनंद प्राप्त करता है. गीता में कहा गया है कि काम, क्रोध व लोभ यह तीन प्रकार के नरक के द्वार है जो व्यक्ति के पतन का कारण बनते हैं। इन्हें त्याग देने में ही भलाई है।

 

इन दुर्गुणों को भी त्याग देना चाहिए

 

चाणक्य ने और भी कई तरह के दुर्गुणों के बारे में भी बात की है। ऐसा कहा जाता है कि मोह के अलावा क्रोध, लोभ और कामना भी ऐसा दुर्गुण है जिसमें पर कर मनुष्य को हर तरह से हानी का सामना करना पड़ता है।

क्रोध

क्रोध से आदमी की बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है। ऐसा कहा जाता है क्रोध से आदमी के सोचने की क्षमता का नाश हो जाता है। इसलिए कभी भी क्रोध नहीं करना चाहिए।

लोभ

 

किसी भी चीज को पाने की इच्छा को लोभ कहते हैं। लोभ से ही पाप की उत्पति होती है इसलिए लोभ को त्याग देना चाहिए। लोभ से आपकों हर तरह के नुकसान का सामना करना पड़ता है।

 

डिस्क्लेमर: ऊपर लिखी गई बातें धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है। हम इनमें से किसी भी बात की सत्यता की पुष्टि नहीं करते हैं। किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें।

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