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महिलाओं के बारे में ये बातें नहीं जानते होंगे आप

पुरूषों की यह शिकायत आम होती है कि वे महिलाओं को नहीं समझ पाते, लेकिन ये तथ्‍य जानकर आप समझ जाएंगे कि महिलओं को समझ पाना वाकई में कठिन ही है।
1.  महिलाओं के हार्मोन्‍स में जल्‍दी जल्‍दी बदलाव होते रहने के कारण उनकी संवेदनशीलता, हाव भाव और एनर्जी में भी बदलाव होते रहते हैं। 80 प्रतिशत महिलाओं को झेलना पड़ता है पी.एम. – ये माहवारी से 1-2 हफ्ते पहले के लक्षण होते हैं। इसी के चलते उनमें शारीरिक और मानसिक बदलाव होते हैं। माहवारी के 10 दिन बाद ऐस्‍ट्रोजन और टेस्टेस्‍टेरॉन हार्मोन बढ़ने के कारण उनमें कामोत्‍तेजना बढ़ जाती है। इसके एक हफ्ते बाद प्रोजेस्‍टेरॉन हार्मोन बढ़ने से उनकी इच्‍छा आलिंगन एवं विश्राम की होती है। इसके एक हफ्ते बाद प्रोजेस्‍टेरॉन हार्मोन में कमी आने से उनमें चिड़चिड़ापन दिखाई देने लगता है। अधिकांश महिलाओं का व्‍यवहार माहवारी शुरू होने के 12 से 24 घंटे पहले काफी चिड़चिड़ा हो जाता है।

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2. म‍हिलाएं संकेतों को समझने में पुरूषों से तेज होती हैं। उनमें ये विशेषता इसीलिए भी होती है क्योंकि वे अबोध बच्‍चों की परवरिश करना बेहतर ढंग से जानती हैं। इसी कारण महिलाएं सामान्‍यत लोगों की चुप्‍पी को सहन नहीं कर पातीं। उन्‍हें बेशक कोई नकारात्‍मक प्रकिया दे पर वे नहीं चाहतीं कि कोई बिना प्रतिक्रिया दिए उनके बारे में कोई बात अपने दिल में रखे।
3. डर या धमकी महसूस होने पर वे शत्रु से लड़ने की बजाय दूसरों से मदद लेना ही उचित समझती हैं। ऐसे हालातें में वे काफी चतुराई से काम लेती हैं। एक शोध बताता है कि महिलाएं तनाव को सीमित मात्रा में झेलने में ही समर्थ हैं।
4. महिलाओं में कामवासना पुरूषों की अपेक्षा शीघ्र नहीं उभरती। कामोत्‍तेजित करने के लिए और शारीरिक संबंध बनाने के दौरान उन्‍हें सुखद अनुभूति प्रदान करने के लिए उन्‍हें शारीरिक एवं मानसिक दोनों रूपों से कामोत्‍तेजित करना पड़ता है। चुम्‍बन, आलिंगन आदि उपाय उनकी काम वासना को बढ़ाने में कारगर सिद्ध होते हैं।

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5. गर्भावस्‍था के दौरान महिलाओं के मस्‍तिष्‍क का आकार 4 प्रतिशत तक छोटा हो जाता है। एक शोध के अनुसार गर्भावस्‍था के दौरान हॉर्मोन में होने वाले बदलाव के कारण याददाश्‍त कमजोर होने जैसी समस्‍या भी हो जाती हैं। एक शोध के अनुसार कोई महिला कभी गर्भवती नहीं रही हो फिर भी किसी बच्‍चे की देखभाल करने या उसे गोद में लेने पर उसमें मातृत्‍व संबंधी हार्मोन स्‍वाभाविक रूप से स्रावित होने लगता है।
6. 43 से 48 वर्ष के दौर की अवस्‍था को दूसरी किशोरावस्‍था भी माना जाता है। महिलाओं के इस दौर को पेरिमेनोपॉज भी कहते हैं, इस दौरान उन्‍हें रात में पसीना आने और अनियमित माहवारी जैसी समस्‍याएं होती हैं।
7. एक पूर्ण परिपक्‍व पुरूष की बजाय महिला काफी जोखिम उठाने वाली होती है। वह रोमांच को काफी पसंद करती है साथ ही उन्‍हें घूमना,‍ फिरना, पढाई, संभोग, करियर संबंधी शौक भी होते हैं।

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