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कैसे पैदा हो डॉक्टरों में ‘जादू की झप्पी’ वाली संवेदनाएं

शोध में शामिल 66 फीसदी डॉक्टर अपने मरीजों के प्रति सहानुभूति या व्यक्तिगत जुड़ाव का कोई भाव नहीं रखते
बरसों पहले संजय दत्त ने मुन्नाभाई एमबीबीएस नामक फिल्म में डॉक्टर समुदाय की एक बेहद गंभीर समस्या को रेखांकित किया था। वो था डॉक्टरों में मरीज को लेकर सहानुभूति के भाव का खत्म होना और मरीज को सिर्फ एक ‘सब्जेक्ट’ समझना। फिल्म में फर्जी तरीके से मेडिकल कॉलेज में एडमिशन लेकर मुन्ना भाई उस कॉलेज की कुछ मूल समस्याओं को उजागर करते हैं। भले ही सिनेमा देखकर दर्शक इसे सिर्फ हंसी मजाक समझें मगर भारत ही नहीं पूरी दुनिया में डॉक्टरों का बर्नआउट या कहें अक्रियाशीलता ये एक गंभीर समस्या है। विदेशों में तो इसपर बहुत रिसर्च हो रहे हैं मगर भारत में अब तक डॉक्टरों को लेकर कायदे से किसी तरह का रिसर्च हो ही नहीं रहा है। अब एक अध्ययन सामने आया है जिसने डॉक्टरों की क्षमताओं के हद से ज्यादा दोहन और इसके कारण बर्नआउट तथा अन्य समस्याओं की ओर ध्यान आकृष्ट किया है।

इसी अध्ययन में सामने आया है कि शोध में शामिल 66 फीसदी डॉक्टर अपने मरीजों के प्रति सहानुभूति या व्यक्तिगत जुड़ाव का कोई भाव नहीं रखते। दुनिया भर में डॉक्टरों के अक्रियाशीलता के तय पैमाने का इस्तेमाल करते हुए भारत में दो डॉक्टरों ने इस शोध को अंजाम दिया जिसके चौंकाने वाले नतीजे मेडिकल जर्नल क्यूरियस में प्रकाशित हुए हैं। इस शोध के अनुसार करीब 45 फीसदी डॉक्टरों में मानसिक थकावट के गंभीर लक्षण पाए गए जबकि 66 फीसदी डॉक्टरों ने माना कि मरीजों के साथ उनका उनकी किसी तरह की कोई सहानुभूति नहीं है।

इस शोध के दौरान करीब 500 डॉक्टरों को 25 बिंदुओं वाली प्रश्नावली दी गई थी और इनमें से कई डॉक्टरों ने माना कि काम के दौरान उन्हें पर्याप्त अवसर नहीं मिलते, कार्यस्‍थल की जरूरतों को पूरा करने के लिए अपनी निजी जरूरतों की उपेक्षा करनी पड़ती है और काम के दबाव के कारण खुद को और बेहतर बनाने की तरफ वो ध्यान ही नहीं दे पाते। इसे सीधे तौर पर इस तरह समझ सकते हैं कि लगातार एक ही तरह से काम करते रहने के कारण डॉक्टर भी मशीनी अंदाज में अपने काम को अंजाम देते रहते हैं जिसमें किसी तरह की संवेदनाओं के लिए कोई जगह नहीं बचती। डॉक्टरों में बर्नआउट या अक्रियाशीलता एक गंभीर सामाजिक मुद्दा है जो सीधे-सीधे चिकित्सा सेवाओं और मरीजों पर असर डालता है। आधुनिक इलाज तेजी से बदल रहा है जिसने चिकित्सकों के सामने नई चुनौतियां पैदा की हैं। जैसे-जैसे पेशे की मांग बढ़ती जा रही है वैसे-वैसे डॉक्टरों का फ्रस्ट्रेशन भी बढ़ता जा रहा है। डॉक्टरों के बीच बढ़ती इस गंभीर समस्या के बारे में देश में डॉक्टरों की सबसे बड़ी संस्‍था इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉक्टर के.के. अग्रवाल कहते हैं कि किसी भी दूसरे पेशे के मुकाबले डॉक्टरों में बर्नआउट ज्यादा गंभीर चिंता का कारण है क्योंकि इससे पीड़ित डॉक्टरों में मरीजों के प्रति सहानुभूति की कमी और फैसले लेने में विचलन जैसे परिणाम देखने को मिलते हैं। डॉक्टरों में विशेषज्ञता और मरीजों की संख्या बढ़ने के साथ बर्नआउट की समस्या बढ़ती जाती है।

चूंकि देश में विशेषज्ञ डॉक्टरों की संख्या सीमित है इसलिए डॉक्टरों को ज्यादा घंटों तक काम करना पड़ता है और इसलिए उनमें फ्रस्ट्रेशन बढ़ता जाता है। डॉक्टरों में संवेदनाओं की सुस्ती कोई रातों रात पैदा होने वाली स्थिति नहीं है। कार्यस्‍थल का दबाव, लोगों की जिंदगी अपने हाथों में होने वाली जिम्मेदारी का अहसास और इसके अलावा एक विपरीत स्वास्‍थ्यसेवा माहौल में लगातार दुख-दर्द को देखते रहने के कारण यह स्थिति पैदा हो जाती है। इसके अलावा एक और मुख्य वजह यह है कि हमारे देश में अपनी भावनाओं को जांचने के लिए किसी तरह का कोई प्रशिक्षण नहीं दिए जाने के कारण डॉक्टर अपने अंदर संवेदना पैदा होने पर अपराधबोध की भावना से भर जाते हैं। डॉक्टर अग्रवाल कहते हैं, चिकित्सा पेशेवरों के लिए यह जरूरी है कि वे एक संतुलित जीवन जीएं और अपने लिए भी समय निकालें। प्राथमिकताएं तय करें और स्वस्‍थ्य जीवनशैली अपनाए। यह सभी चीजें मेडिकल की पढ़ाई में नहीं सिखाई जातीं और न ही ये उस समय तक इंतजार करेंगी जब तक कि बर्नआउट की समस्या आपको घेर न ले। इसलिए यह तय करना कि आपके लिए क्या ज्यादा जरूरी है, इस स्थिति से बचने की अच्छी शुरुआत हो सकती है।

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