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दवाइयों के गोरखधंधे से सब परेशान

ये जानकारी आपको परेशान कर सकती है मगर सच जानना आपका अधिकार है। भारत में डायबिटीज के लिए डॉक्‍टरों द्वारा दी जाने वाली सबसे लोकप्र‍िय 5 दवाओं जिन्‍हें मेटाफॉर्मिन को अन्‍य दवाओं के साथ मिलाकर तैयार किया गया है, में से एक भी दवा विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य संगठन यानी डब्‍ल्‍यूएचओ द्वारा दवाओं की जांच के लिए निर्धारित सघन जांच प्रक्रिया से नहीं गुजरी है। बीएमजे ग्‍लोबल हेल्‍थ में प्रकाशिक एक अध्‍ययन में ये दावा किया गया है। हाल के वर्षों में दवा निर्माता कंपनियों में मेटाफोर्मिन की तय मात्रा को दूसरी दवाओं की तय मात्रा के साथ मिलाकर नई दवा बनाने का चलन तेजी से बढ़ा है और ये नई दवाएं डायबिटीज पर अलग तरह से असर करती हैं। इ अध्‍ययन में दावा किया गया है कि भारत में सबसे अधिक लिखी जाने वाली मधुमेह की ऐसी शीर्ष पांच मिश्रित दवाइयां 500 अलग-अलग ब्रांड नाम से देश में बिक रही हैं। इस अध्‍ययन के नतीजे तब ज्‍यादा परेशान करते हैं जब हमें ये पता चलता है कि इन दवाओं के क्लिनिकल ट्रायल के नतीजे या तो सार्वजनिक रूप से उपलब्‍ध ही नहीं हैं या जो उपलब्‍ध हैं भी वो बहुत खराब गुणवत्‍ता दर्शाते हैं। अध्‍ययन में सुझाव दिया है कि उपलब्‍ध तथ्‍यों की रोशनी में मरीज को अपनी दवा बदलने से पहले हमेशा विशेषज्ञ की सलाह लेनी चाहिए। इस बारे में इंडियन मेडिकल मेडिकल एसोसिएशन के पूर्व अध्‍यक्ष और हार्ट केयर फाउंडेशन ऑफ इंडिया के अध्‍यक्ष डॉक्‍टर के.के. अग्रवाल ने कहा, “ये स्‍थापित करने के लिए कि दो दवाइयां, जिनमें एक असली पेटेंटेड दवा हो और दूसरी उसकी जेनरिक वर्जन, एक ही उद्देश्‍य के लिए एक ही तरह से जैसा काम कर रही है और उनमें जैव समानता है, बायोइक्‍वीवेलेंस यानी जैव समानता से संबंध‍ित अध्‍ययन किए जाते हैं। किसी भी दवा का सबसे महत्‍वपूर्ण चरित्र होता है

आविष्‍कार किए गए दवा के साथ उसकी जैव समानता जिससे उसकी सेफ्टी, क्लिनिकल क्षमता साबित होती है।” डॉक्‍टर अग्रवाल ने कहा कि ये जरूरी है कि सरकार गुणवत्‍ता गारंटी इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर को मजबूत करे ताकि दवाओं के हर बैच की गुणवत्‍ता सुनिश्चित हो सके। दवाओं से संबंधित कानूनों का पालन कड़ाई से सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्‍त संख्‍या में नियामक मैन पावर की तैनाती भी की जानी चाहिए। डॉक्‍टर अग्रवाल के अनुसार भारत में मिलने वाली 95 फीसदी दवाएं बिना पेटेंट के जेनेरिक दवाएं हैं। ये दवाइयां बाजार में जेनेरिक नाम, ट्रेड नाम या फ‍िर किसी कंपनी के ब्रांड नाम से उपलब्‍ध हैं। चूंकि इन दवाओं पर कोई पेटेंट लागू नहीं होता इसलिए हजारों कंपनियां एक ही दवा को अलग-अलग नाम से बेच सकती हैं। अलग-अलग ब्रांड नाम का सिर्फ इतना ही अर्थ है कि एक ही दवा अलग-अलग कंपनी बेच रही है। डॉक्‍टर अग्रवाल कहते हैं कि एक ही दवा को अलग-अलग नाम और अलग-अलग कीमत पर बेचने पर भी रोक लगनी चाहिए। दवा संबंधी कानूनों के पालन के साथ ही यह भी जरूरी है कि सरकार ऐसी दवाओं की खुलेआम बिक्री पर सख्‍ती से रोक लगाए जिन्‍हें सिर्फ डॉक्‍टर के पर्चे के आधार पर ही बेचने की छूट है।

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