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Mutual Funds में निवेश करते समय न करें यह 10 गलतियां

म्यूचुअल फंड में निवेश से बड़ा फायदा हो सकता है, लेकिन इसमें रिस्क भी बड़ा होता है क्योंकि यह शेयर बाजार पर आधारित होते हैं। अमूमन निवेशकों को फंड का निवेश किस तरह काम करता है इस बारे में कुछ बुनियादी गलतफहमियां होती हैं। इससे वे कई बार ऎसी गलतियां कर बैठते हैं कि अच्छा खास मुनाफा नुकसान में बदल जाता है। म्यूचुअल फंड में निवेश के दौरान यह गलतियां न करें-

म्यूचुअल फंड में निवेश करने से पहले ऑफर डॉक्यूमेंट या प्रॉस्पेक्टस को ध्यान से पढ़ें। यह डॉक्यूमेंट लीगल होता है और म्यूचुअल फंड मैनेजमेंट कंपनी आपके पैसे को कहां और किस स्ट्रेटेजी के साथ निवेश करेगी इसका ब्यौरा लिखा होता है। इसके अलावा इसमें और भी महत्वपूर्ण जानकारियां दी होती हैं, जिन्हें पढ़ना जरूरी है।

कई निवेशक म्यूचुअलफंड पोर्टफोलियो में पैसा तो लगाते हैं, लेकिन जब उनसे यह पूछा जाता है कि वे म्यूचुअल फंड मैनेजमेंट कंपनी को कितनी फीस दे रहे हैं, तो उन्हें इस बारें कुछ पता नहीं होता। दरअसल यह म्यूचुअल फंड एंक्सपेंस रेश्यो का हिस्सा है। यह रेश्यो निवेशकों के लिए बेहद अहम है। एक्सपेंस रेश्यो सालाना कैलकुलेट किया जाता है और यह सीधे सीधे निवेशकों के रिटर्न को कम करता है। यानी कि जितना ज्यादा एक्सपेंस रेश्यो उतना कम मुनाफा।

सेल्स लोड दरअसल वह कमिशन है जो आप अपनी जेब से उस कंपनी को देते हैं जिनसें आप म्यूचुअल फंड खरीदते हैं। सेल्स लोड कई तरह के होते हैं जैसे फ्रंट लोड, बैक लोड, डेफर्ड लोड आदि। इसे नजरअंदाज न करें।

यह जानना बेहद जरूरी है कि आप जिस म्यूचुअल फंड में निवेश कर रहे हैं उनकी अंडरलाइंग सिक्यॉरिटी क्या है। कहीं ऎसा तो नहीं कि आपने 12 म्यूचुअल फंड में निवेश किया है और वह सभी एक ही स्टॉक या बॉन्ड या अन्य सिक्यॉरिटी पर अंडरलाय करते हैं। ऎसे में आपको वह डायवर्सिटी नहीं मिलेगी जिसके बारे में सोचते हुए आपने निवेश किया था।

कई म्यूचुअल फंड्स की मल्टीपल शेयर क्लासेस होती हैं। म्यूचुअल फंड में क्लासेस का मतलब होता है फंड में शेयर्स पर चार्ज की जाने वाली फीस। म्यूचुअल फंड कंपनियां सात या इससे ज्यादा शेयर क्लासेस रख सकते हैं, लेकिन इसमें सबसे ज्यादा तीन तरह की क्लासेस चलन में रहती हैं – ए-शेयर्स, बी-शेयर्स और सी-शेयर्स। हर क्लास में अलग तरह के फायदे मिलते हैं।

इक्विटी फंड में डिविडेंड ऑप्शन को नहीं चुनना चाहिए। रेगुलर इनकाम के लिए भी आप ग्रोथ को ही चुनें। इससे आप अपनी सुविधा के मुताबिक पैसा निकाल सकते हैं और एक साल के बाद पैसा निकालने पर टैक्स भी नहीं लगता।

लिक्विड फंड्स लंबे समय का निवेश करने के लिए नहीं होता, इसलिए इसमें जरूरत से ज्यादा निवेश न करें। रूपए की वैल्यू में उतार चढ़ाव चलता रहता है, ऎसे में जरूरी है कि लिक्विड फंड्स को केवल टेम्परेरी फंड पार्क करने के लिए और उस पर ज्यादा रिटर्न कमाने के लिए ही रखा जाए, ना कि इसमें लंबे समय तक पैसे का निवेश किया जाए।

यह न सोचें कि कम नेट असेट वेल्यू (एनएवी) सस्ती और ज्यादा एनएवी महंगी होती है। म्यूचुअल फंड की यूनिट की अपने आप में कोई वेल्यू नहीं होती, क्योंकि यह घर, बॉन्ड या इक्विटी स्टॉक की तरह असेट नहीं होते। इसकी वैल्यू अंडरलाइंस असेट्स पर निर्भर करती है। इस लिहाज से अगर अंडरलाइंस असेट की कीमत बढ़ेगी तो एनएवी अपने आप बढ़ जाएगा।

ज्यादातर निवेशक बढ़त दर्ज करने वाले फंड्स को बेच देते हैं और गिरावट दर्ज कर रहे फंड्स के साथ चिपके रहते हैं। यह बेहद जरूरी है कि आप समय रहते ही लॉस बुक करें नहीं तो भविष्य में आपका लॉस और बढ़ सकता है।

ज्यादातर लोग समझते हैं कि इंडेक्स फंड में ही निवेश करना बेहतर है, लेकिन यह सच नहीं है। उदाहरण के लिए वैनगार्ड के 500 इंडेक्स फंड की अगर बात करें तो यह विश्व का सबसे बड़े म्यूचुअल फंड में शुमार है और इसकी असेट्स 100 बिलियन डॉलर से ज्यादा है, लेकिन यह सबसे सुरक्षित इंडेक्स फंड नहीं है और न ही यह बेस्ट परफॉर्मिग इंडेक्स फंड है। टेक बियर मार्केट में निवेशकों ने 40 बिलियन डॉलर से ज्यादा गंवाया।

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