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अपनाएं ऋषि वात्स्यायन की ये बातें, कभी मात नहीं खाएंगे

ऋषि वात्स्यायन के प्रसिद्ध ग्रन्थ में स्त्री-पुरूषों को सुखी सांसारिक जीवन जीने के तरीके बताए गए हैं। अगर आप इसमें दी गई इन बातों को अपना लेंगे तो कभी मात नहीं खाएंगे

अध्याय 4: श्लोक 1 – गृहीतविद्य: प्रतिग्रहजयक्रयर्निशाधिगतैरर्थैरन्वयागतैरूभयैर्वा गार्हस्थ्यमधिगम्य नागरकमवृत्तं वर्तेत।

अर्थात : विद्या अध्ययन के समय ब्रहमचर्य का पालन करना चाहिए। इसके बाद पैतृक संपत्ति या दान, विजय, व्यापार और श्रम आदि द्वारा धन एकत्र करके विवाह करके गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करना चाहिए। इसके बाद ही सामान्य नागरिकों की तरह जीवन बिताना चाहिए।

अध्याय 2: श्लोक 36 – देवराजश्चाहल्यामतिबलश्च कीचको द्रौपदी रावणश्च सीतामपरे चान्ये च बहवो द्दश्यन्ते कामवशगा विनष्टा इत्यर्थचिंतका:।।

अर्थात : रावण सीता पर, इन्द्र अहिल्या पर और महाबली कीचक द्रौपदी पर बुरी नजर रखने के कारण नष्ट हुए। संसार में ऎसे अनगिनत लोग है काम के वश में होकर नष्ट होते देखे जाते हैं।

अध्याय 2: श्लोक 28 – काल एव हि पुरूषानर्थानार्थयोर्जयरपराजययो: सुखदु:खयोश्च स्थापयति।

अर्थात : समय ही है जो मनुष्य को अर्थ और अनर्थ में, जय और पराजय में तथा सुख और दुख में रखता है।

अध्याय 2: श्लोक 29 – कालेन बेलिरेन्द्र: कृत:। कालेन व्यपरोहित:। काल एव पुनरूप्येन कर्तेति कालकारणिका:।।

अर्थात : समय ही था जिसने बालि को इंद्र के पद पर बिठा दिया और समय ने ही उसे इंद्र के पद से गिरा दिया। इस तरह समय ही सब कर्मो का कारण है।

अध्याय 2: श्लोक 31 – अवश्र्यभाविनोअप्यर्थस्योपायपूर्वकत्वाद्धेव। न निष्कर्मणो भद्रमस्तीती वात्स्यायन:।।

अर्थात : आचार्य वात्स्यायन के अनुसार किसी भी काम को कोशिश करने पर पूरा हो जाने के बाद यह साबित होता है कि निकम्मा आदमी कभी भी सुख को प्राप्त नहीं कर सकता।

अध्याय 2: श्लोक 24 – वरं सांशयिकात्रिकादसांशयिक: कार्षापण:। इति लौकायातिका:।।

अर्थात : नास्तिक लोगों का मानना है कि अंसदिग्ध रूप से मिलने वाला तांबे का बर्तन शंका से प्राप्त होने वाले सोने के बर्तन से अच्छा है।

अध्याय 2: श्लोक 22 – को हयबालिशो हस्तगतं परगतं कुर्यात।

अर्थात : कोई मूर्ख व्यक्ति ही हाथ में आई वस्तु को दूसरों को सौंपेगा, अर्थात कोई भी आदमी अपने अधिकार में आई वस्तु दूसरे को नहीं देना चाहता।

ध्याय 2: श्लोक 23 – वरमद्य कपोत: श्वो मयूरात:।।

अर्थात : कल मिलने वाले मोर से आज मिलने वाला कबूतर ही अच्छा है।

अध्याय 2: श्लोक 33 – तथा प्रमादं लाघवमप्रत्ययमग्राहयतां च।

अर्थात : काम-प्रमाद, अपमान, अविश्वास को पैदा करता है तथा कामी आदमी से सभी लोग नफरत करने लगते हैं।

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