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यहां जानें, क्यों रमजान में ही रखे जाते हैं रोजे

रमजान महीने की शुरुआत हो चुकी है। इस्लामिक कैलेंडर में इस महीने को त्याग, सेवा, समर्पण और भक्ति के रूप में देखा जाता है। इस पूरे महीने में मुस्लिम रोजा रखते हैं। यहां हम आपको बताने जा रहे हैं कि रोजा का महत्व क्या है और इसे रमजान के पाक महीने में ही क्यों रखा जाता है।

रोजा का अर्थ है बंदिश यानी कि मनाही। सिर्फ खाने पीने की ही बंदिश नहीं, बल्कि हर उस बुराई से दूर रहने की बंदिश जो इस्लाम में मना है। इस्लाम के मुताबिक रोजा केवल भूखे प्यासे रहने का नाम नहीं, बल्कि नब्ज को व्यवस्थित और शुद्ध करने का नाम है। हर साल 30 दिन अपनी आत्मा को शुद्ध करके शेष 11 महीने इसी जीवन को जीने की ट्रेनिंग होते हैं रोजे।

मान्यता है कि रमजान के महीने में जन्नत के दरवाजे खुल जाते हैं और जोरोजे रखता है उसे ही जन्नत नसीब होती है। पैगंबर इस्लाम के मुताबिक रमजान का पहला अशरा यानी कि दस दिन रहमत का, दूसरा अशरा मगफिरत और तीसरा अशरा दोजख से आजादी दिलाने का होता है।

यह महीना प्रेम और अपने ऊपर संयम रखना सिखाता है, इसलिए कहा गया है कि मुसलमान को रोजा जरूर रखना चाहिए। मासिक धर्म के दौरान मुस्लिम महिलाओं को रोजा न रखने को कहा गया है, हालांकि वे अपने ये रोजे बाद में पूरे कर सकती हैं।

रमजान के महीने में मुसलमान अल्लाह की इबादत करते हैं और इस दौरान उन्हें शराब, सिगरेट, तंबाकू और नशीली चीजों के सेवन से दूर रहना होता है। बूढें, बच्चे, गर्भवती महिलाएं, नवजात की माओं और सफर करने वाले यात्रियों को रोजा ना रखने की इजाजत है। रमजान के दौरान हम मुस्लिम को जकात देना होता है। इसका मतलब होता है अल्लाह की राह में अपनी आमदनी से कुछ पैसा निकालकर जरूरतमंदों को देना। कहा जाता है कि जकात को रमजान के दौरान ही देना चाहिए ताकि गरीबों तक वो पहुंचे और वो भी ईद मना सकें।