Times Bull
News in Hindi

कब, क्या चाहती हैं महिलाएं, सारे राज खोलेंगी ये बातें

कहा जाता है त्रिया चरित (औरतों के स्वभाव) को स्वयं भगवान भी नहीं समझ सकते, साधारण मनुष्यों की बात ही क्या हैं। परन्तु इन 10 सूत्रों को जान कर और समझ कर आप किसी भी लड़की के स्वभाव को एक क्षण में पहचान सकते हैं।

भर्तृहरि श्रृंगार शतकः स्त्रियों के अस्त्र व आभूषण

भ्रूचातुर्यात्कुन्चिताक्षा: कटाक्षा स्निग्धा वाचो लज्जितान्ताश्च हासा:
लीलामन्दं प्रस्थितंच स्थितंच, स्त्रीणामेददू भूषणं चायुधंच। (भर्तृहरि श्रृंगार शतक 3)

भौंहों के फेरने की चतुराई से पूर्ण आंखों का मारना, मधुर भाषण करना, मुस्कुराहट के साथ लज्जा के भाव को दिखाना, इठलाते हुए, धीरे-धीरे चलना स्त्रियों के आभूषण हैं और इन्हीं से वे किसी भी पुरुष को अपने वश में कर लेती हैं।

भर्तृहरि श्रृंगार शतकः स्त्रियों की सुंदरता

वक्त्रं चन्द्रविकासि पंकजपरीहासक्षमे लोचने स्वर्णमपाकरिष्णुरलिनीजिष्णु: कचानांचय:
वक्षोजाविभकुम्भसंभ्रमहरौ गुर्वी नितम्बस्थली वाचां हारि च मार्दव युवतिषु स्वाभाविकं मण्डलम। (भर्तृहरि श्रृंगार शतक 5)

चन्द्रमा के समान खिलने वाला मुख, कमल को लजाने वाले नेत्र, सुवर्ण के समान कान्तियुक्त उज्जवल शरीर, भ्रमरियों को भी जीतने वाले काले-काले घुंघराले बाल, हाथी के कुंभ स्थल की शोभा को नीचा दिखाने वाले वक्षस्थल, सुदृढ़ कमनीय कटि (कमर), मन को चुराने वाली वाणी की मधुरता ये सभी स्त्रियों के स्वाभाविक आभूषण हैं। इन्हीं के सहारे स्त्रियां बड़े से बड़े योगी को भी सहज ही आकर्षित कर लेती हैं।

भर्तृहरि श्रृंगार शतकः स्त्रियों की क्रीड़ाएं

समोहयन्ति मदयन्ति विडम्बयन्ति, निर्भर्त्सयन्ति रमयन्ति विषादयन्ति
एता: प्रविश्य सदयं ह्रदयं नाराणां किं नाम वामनयना न समाचरन्ति। (भर्तृहरि श्रृंगार शतक 21)

नवयुवतियां, पुरूषों के ह्रदय में घुसकर क्या-क्या नहीं कर गुजरती हैं? सर्वप्रथम तो ये पुरूषों का सामना होते ही उन्हें अपने मोहजाल में फाँस लेती हैं, उनको पागल बना देती हैं। स्वंय उनका अनुकरण करने लग जाती हैं, संभोग तथा काम-क्रीड़ा करने लगती हैं, और उनके दूर चले जाने पर दुख का अभिनय करने लगती है।

भर्तृहरि श्रृंगार शतकः धरती पर स्वर्ग

स्वपरप्रतारकोऽसौ निन्दति योऽलीकपण्डितो युवती
यस्मात्तपसोऽप फिलंस्वर्गस्तस्यापि फलंतथाप्सरस:। (भर्तृहरि श्रृंगार शतक 51)

जो स्त्रियों की निंदा करता है वह झूठ बोलने में पंडित है और दूसरों को ठगने वाला है, क्योंकि जिस तप का फल स्वर्ग है उस स्वर्ग में भी उर्वशी जैसी अनन्य सुंदर अप्सराओं का संबंध सुख मिलता है।

मालती शिरसि जृम्भणोन्मुखी चन्दनं वपुषि कुंकुमान्वितम
वक्षसि प्रियतमा मनोहरा स्वर्ग एष परिशिष्ट आगम: (भर्तृहरि श्रृंगार शतक 24)

खिलने वाली मालती के फूलों की माला गले में पड़ी हो, केसर मिश्रित चंदन का उबटन शरीर में लगा हुआ हो और प्राणप्यारी सुंदरी शरीर से लिपटी रहे तो समझना चाहिए कि असली स्वर्ग यही है। शास्त्रों में बताया गया स्वर्ग इस सुख के आगे व्यर्थ है।

भर्तृहरि श्रृंगार शतकः मदोन्मत्त स्त्रियां

उन्मत्तप्रमसंरम्भादारभन्ते यदंगना। तत्र प्रत्यूहमाघतुं ब्रह्मापि खलु कातर:। (भर्तृहरि श्रृंगार शतक 54)

स्त्रियां प्रेम में उन्मत्त होकर जिस कार्य को करने लग जाती हैं, ब्रह्मा (भगवान) भी फिर उन्हें उस काम को करने से रोक नहीं सकता।

भर्तृहरि श्रृंगार शतकः स्त्री त्याग व कामदेव का कोप

स्त्रीमुद्रां मकरध्वजस्य परमां सर्वार्थसम्पत्करीं ये मूढ़ा: प्रविहाय यान्ति कुधियो स्वर्गादिलोभेच्छया।
ते तेनैव निहत्य निर्दतरं नग्नीकृता मुण्डिता: केचित्पंचशिखीकृताश्च जटिला: कापालिकाश्चापरे। (भर्तृहरि श्रृंगार शतक 58)

समस्त कार्य और सम्पत्ति को देने वाली कामदेव की मुद्रा स्वरूप स्त्री को स्वर्गादि के लाभ की इच्छा से जो कुबुद्धि मूर्ख मनुष्य त्याग देते हैं अर्थात विरक्त हो जाते हैं, उनको विरक्त वेश में न समझो किन्तु ऐसा समझो कि कामदेव ने ही उनके स्त्री त्याग से क्रुद्ध होकर निर्दयतापूर्वक उनमें से किसी को नंगा बना दिया, किसी को मुंडवा दिया, किसी को पांच चोटी रखवा दी, किसी को जटाधारी बनवा दिया और किसी के हाथ खप्पर देकर भीख मंगवा दी।

भर्तृहरि श्रृंगार शतकः ऐसी स्त्री प्रिया नहीं होती

स्मृता भवति तापाय दृष्टा चोन्मादवर्धिनी स्पृष्टा भवति मोहाय सा नाम दयिता कथम। (भर्तृहरि श्रृंगार शतक 65)

जो स्त्री स्मरण करने मात्र से संताप (दुख) देती है, देखने पर पागल बना देती है, स्पर्श करने पर मोहित कर देती है, वह प्रिया कैसे हो सकती है?

भर्तृहरि श्रृंगार शतकः स्त्रियों की वास्तविकता

जल्पन्ति साद्र्धमन्येन पश्यन्त्यन्यं सविभ्राम: ह्रदये चिन्तयन्त्यन्यंप्रिय: को नाम योषिताम्।
मधु तिष्ठति वाचि योषितां ह्रदहालाहलमेवकेवलम अत एव निपीयतेऽधरो ह्रदय मुष्टिभिरेव ताड्येत। (भर्तृहरि श्रृंगार शतक 71-72)

स्त्रियों का यथार्थ में कोई प्रिय नहीं है, ये किसी से बात करती हैं, तो किसी और को ही विलास भरी दृष्टि से देखती हैं और ह्रदय में किसी और को ही चाहा करती हैं। स्त्रियों की वाणी में मधु और ह्रदय में केवल विष रहा करता है। इसलिए इनका अधरपान किया जाता है और ह्रदय को मर्दन के बहाने मुटि्ठयों से ताडित किया जाता है।

भर्तृहरि श्रृंगार शतकः पुरुषों के लिए हैं दो ही मार्ग दिश

वहरिणेभ्यो वंशकाण्डच्छवीनां कवलमुपलकोटिच्छिन्नमूलं कुशानाम
शुकयुवतिकपोलापाण्डुताम्बूलवल्ली- दलमरूणनखाग्रै: पाटितं वा वधूभ्य:। (भर्तृहरि श्रृंगार शतक 95)

हे पुरूषों! आप लोग जंगली हिरणों को खाने के लिए हरी-हरी घास दो, अथवा अपना प्रियतमाओं के लिए नखों से तोड़े हुए शुक युवतियों के समान पांडु वर्ण वाले अच्छे-अच्छे ताम्बूल के पत्ते दो। अर्थात संसार में पुरूषों के लिए दो ही रास्ते हैं, या तो अपनी प्रेमिकाओं के साथ संभोग करते हुए संसार का आनंद लो या वनवास लेकर तपस्या करो।

Get real time updates directly on you device, subscribe now.

Leave A Reply

Your email address will not be published.