चारधाम यात्रा: यहां से होकर जाता है स्वर्ग की सीढ़ी का रास्ता

हिंदुओं के लिए चारधाम यात्रा का मतलब है स्वर्ग की सीढ़ी। धर्मग्रंथों में इस यात्रा की महिमा का काफी गुणगान किया गया है। कहा जाता है कि जिसने चारधाम देख लिए उसने मानो धरती पर ही स्वर्ग के दर्शन कर लिए। अक्षय तृतीया (आखातीज) के साथ ही उत्तराखंड के चारों धाम (यमुनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ और बद्रीनाथ) धाम की यात्रा शुरू हो गई। 5 साल पहले हुए केदारनाथ हादसे के बाद यह पहला साल था, जब देश के कोने-कोने से बड़ी संख्या में तीर्थ यात्रियों का इन स्थानों पर आना हुआ। आज हम आपको बता रहे हैं, चारधाम यात्रा का पूरा रूट

उत्तराखंड के रूद्रप्रयाग जिले में पडऩे वाले केदारनाथ धाम के लिए हरिद्वार से 165 किलोमीटर तक पहले रुद्रप्रयाग या ऋषिकेश आना पड़ता है जो कि चारधाम यात्रा का बेसकैम्प है। इसके बाद ऋषिकेश से गौरीकुंड की दूरी 76 किलोमीटर है। यहां से 18 किलोमीटर की दूरी तय करके केदारनाथ के धाम पहुंच सकते हैं। गौरीकुंड से जंगलचट्टी 4 किलोमीटर है। उसके बाद रामबाड़ा नामक जगह पड़ती है और फिर अगला पड़ाव पड़ता है लिनचैली। गौरीकुंड से यह जगह 11 किलोमीटर दूर है। लिंचैली से लगभग 7 किलोमीटर की पैदल दूरी तय करके केदारना धाम पहुंचा जाता है। केदारनाथ धाम और लिंचैली के बीच नेहरू पर्वतारोहण संस्थान ने 4 मीटर चौड़ा सीमेंटेड रास्ता बना दिया है, ऐसे में श्रद्धालु अब आसानी से केदारनाथ धाम पहुंच सकते हैं।

बद्रीनाथ हाईवे पर कई स्लाइडिंग जोन बाधा बनते रहे हैं। इसमें से जहां सिरोहबगड़ नामक स्लाइडिंग जोन का ट्रीटमेंट सरकार करा रही है और इसके बाधित होने पर इसका बाईपास तैयार किया जा रहा है। वहीं लामबगड़ में टनल के जरिए यात्रा का बाईपास बनाने की बात सरकार कर रही है। इस बार सरकार ने इस स्लाइडिंग जोन के दोनों तरफ सप्लाई के लिए मशीनें तैनात करी हैं। पूरे चारधाम यात्रा में 271 संवेदनशील क्षेत्रों पर भी प्रशासन सावधानी बरतने की बात कह रहा है। बद्रीनाथ तक गाडिय़ां जाती हैं, इसलिए यहां मौसम अनुकूल होने पर पैदल नहीं जाना पड़ता। बद्रीनाथधाम को बैकुण्ठ धाम भी कहा जाता है। बैकुण्ठधाम जाने के लिए ऋषिकेश से देवप्रयाग, श्रीनगर, रूद्रप्रयाग, कणज़्प्रयाग, चमोली, गोविन्दघाट होते हुए पहुंचा जाता है।

गौमुख ग्लेशियर को गंगा का उद्गम स्थल माना जाता है। समुद्र तल से 3140 मीटर की ऊंचाई पर स्थिति गंगोत्री का मंदिर उत्तरकाशी जिले में पड़ता है। गंगोत्री का मुख्य पड़ाव चिन्याली सौड़ से शुरू होता है। गंगोत्री तक जाने के लिए पैदल नहीं जाना होता। गंगोत्री मंदिर का निर्माण 1807 में नेपाली सेना प्रमुख अमर सिंह थापा ने करवाया था। इसके बाद गंगोत्री का मौजूदा मंदिर जयपुर नरेश माधौ सिंह ने बनवाया। इस गंगा तीर्थ के लिए ऋषिकेश से टिहरी जिले के चम्बा होते हुए टिहरी धरासू, उत्तरकाशी भटबाड़ी और हर्षिल होते हुए गंगोत्री तक अपने वाहन या गाड़ी से पहुंचा जा सकता है।

यमुनोत्री मंदिर भी उत्तरकाशी जिले के अंतर्गत यमुनाघाटी में पड़ता है। यमुना का उद्गम समुद्र तल से 4421 मीटर ऊंचाई पर कालिंदी पर्वत से माना जाता है। यमुनोत्री मंदिर समुद्र तल से 3323 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। यहां जाने के लिए 6 किलोमीटर की यात्रा पैदल करनी होती है। यमुनोत्री मंदिर में मां यमुना की पूजा अर्चना होती है। यमुनोत्री मंदिर का निर्माण गढ़वाल नरेश सुदर्शन शाह ने 1855 के आसपास करवाया था और इसके बाद यहां मूर्ति स्थापित की। यमुनोत्री पहुंचने के लिए धरासू तक का मार्ग वही है जो गंगोत्री का है। इसके बाद धरासू से यमुनोत्री की तरफ बड़कोट फिर जानकी चट्टी तक बस द्वारा यात्रा होती है। जानकी चट्टी से 6 किलोमीटर चलकर यमुनोत्री पहुंचा जाता है।

बद्रीनाथ धाम से चार किमी आगे समुद्र तल से 19,000 फुट की ऊंचाई पर हिमालय की गोद में बसा है भारत का अंतिम गांव माणा। माणा गांव तिब्बत के पहले आखिरी भारतीय गांव है। इस गांव में इंडो-मंगोलियन जनजाति निवास करती हैं। यहीं व्यास गुफा है। सरस्वती नदी के ऊपर बना प्राकृतिक भीम पुल भी स्थित है। इसके पास ही वसुंधरा झरना है जो 122 मीटर ऊंचाई पर है। यह सब मिलकर गजब का नैसर्गिक दृश्य बनाते हैं।

बद्रीनाथ से 25 किमी दूर स्थित सतोपंथ झील के बारे में स्कन्द पुराण में बताया गया है कि इस तिकोनी झील के तीनों कोनों पर ब्रह्मा, विष्णु व महेश का वास है। मान्यता है कि हर साल सितम्बर माह की एकादशी के दिन ब्रह्मा, विष्णु व महेश एक साथ इस झील में स्नान करते हैं, इसलिए उस दिन इसमें स्नान करने का विशेष महातम्य है। लेकिन, एकादशी पर सतोपंथ झील में स्नान करने वालों में विदेशी यात्रियों की तादात ज्यादा रहती है। लेकिन यहां जाने का रास्‍ता काफी मुश्किल है। यहीं पर अलकनंदा और लक्ष्‍मण गंगा का संगम स्‍थल भी है जिसको गोबिंदघाट के नाम से जानते हैं।

यह कुंड अलकनंदा नदी के किनारे स्थित प्राकृतिक गर्म पानी का कुंड है। बद्रीनाथ मंदिर की पूजा-अर्चना के पहले श्रद्धालु इस कुंड में पवित्र स्नान करते हैं। इसके बाद मंदिर में प्रवेश करते हैं। माना जाता है कि इस कुंड का पानी स्वास्थ्य के लिए काफी लाभदायक होता है।

यह कुंड बद्रीनाथ से 43 किलोमीटर दूर फूलों की घाटी के पास स्थित है। यह कुंड सिक्खों का महत्वपूर्ण तीर्थस्थल है। यह माना जाता है कि दसवें गुरू गुरू गोबिंद सिंह अपने पिछले जन्म में इसी कुंड के तल में बैठकर गहन ध्यान में लीन होकर ईश्वर में विलीन हुए थे। इस कुंड के पास में ही लक्ष्मण मंदिर है जहां इन्होंने तपस्या की थी।

इन दो धामों की यात्रा के बीच कई अन्य मंदिर भी तीर्थयात्रियों को सुकून देते हैं। इनमें योगबद्री पांडकेश्वर, भविष्यबद्री मंदिर, नृसिंह मंदिर, बासुदेव मंदिर, जोशीमठ, ध्यानबद्री, उरगम जैसे मंदिर बद्रीनाथ यात्रा मार्ग के आसपास पड़ते है। जबकि केदारनाथ यात्रा मार्ग पर विश्वनाथ मंदिर गुप्तकाशी, मदमहेश्वर मंदिर, महाकाली मंदिर कालीमठ, नारायण मंदिर, त्रिगुणी नारायण, तुंगनाथ मंदिर, काली शिला पड़ते हैं। इसके अलावा पांच प्रयागों में से रूद्रप्रयाग, देवप्रयाग केदार मार्ग पर और तीन प्रयाग बद्रीनाथ मार्ग पर क्रमश: कर्णप्रयाग, नंदप्रयाग और विष्णुप्रयाग पड़ते हैं। इसके अलावा धारी देवी सिद्धपीठ बद्रीनाथ-केदारनाथ जाने वाले मार्ग के आसपास पड़ता है। जबकि अनुसूइया मंदिर बद्रीनाथ मार्ग से कुछ दूरी पर गोपेश्वर में तो रघुनाथ मंदिर देवप्रयाग दोनों धामों के मार्ग पर पड़ जाता है। इसलिए चारधाम के श्रद्धालु यहां भी आते हैं।

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