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कोमा में थी वो, लाइफ सपोर्ट हटाने की बात सुनते ही अचानक उठ बैठी

गुलियन बेरी सिंड्रोम (जीबीएस) – ये उस बीमारी का नाम है, जिससे पीड़ित होने वाले की जिंदगी अचानक से इतनी ज्यादा बदल जाती है कि वो जिंदा लाश की तरह हो जाता है। हाल ही में ब्रिटेन की एक महिला भी इस रोग से इतना पीड़ित हुई कि उसे लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर ही रखना पड़ गया। लेकिन मौत के मुंह तक पहुंचने के बाद भी वो अपनी जिंदगी में वापस लौट आई और उसकी हालत में भी सुधार हो रहा है।

दरअसल, ब्रिटेन के लगभग 1200 लोग गुलियन बेरी सिड्रोंम से पीड़ित हैं और उनमें एक जैनी बोन भी है। जैनी के मुताबिक जब इस बीमारी की वजह से पहली बार तब पीड़ित हुई जब वो सेंट्रल लंदन के टॉवर ब्‍लॉक में अकेली थी, पैर में दर्द ऊपर की ओर बढ़ता जा रहा था, लेकिन किसी तरह वो ट्रेन पकड़कर बेडफोर्डशायर में अपने घर पहुंची। जिसके बाद अस्‍पताल में भर्ती होने पर उन्हें ये बीमारी होने की बात कही गई।

जैसा कि इस बीमारी से पीड़ित होने पर होता है, हाथ और पैर के साथ शरीर के कई अंग काम करना बंद कर देते हैं। जैनी के साथ भी ऐसा ही हुआ। उसके शरीर के अंगों ने काम करना बंद कर दिया तो उसे लाइफ सपोर्ट सिस्‍टम पर रखा गया। वो कोमा में चली गई थी।

जैनी के बचने की उम्‍मीद न देखते हुए डॉक्‍टर्स ने उसके पति जॉन से पूछा कि क्‍या उसका लाइफ सपोर्ट सिस्‍टम बंद कर दिया जाए। डॉक्टर्स की बातें सुनते ही जैनी कोमा से वापस आ गई, जो कि किसी चमत्कार ने कम नहीं था।

जैनी के मुताबिक पिछले साल 14 मार्च को उसने पैर में सुई की चुभन आखिरी बार महसूस की थी, फिर भी वो अपने काम (सरकारी इमारतों के सर्वे का काम) पर जाती थी। इस रोग में दिमाग का एक बड़ा हिस्‍सा क्षतिग्रस्‍त हो गया था, जिसकी वजह से रिफलेक्‍स टेस्‍ट यानी अनैच्छिक क्रियाओं की भी प्रतिक्रिया नहीं दे रही थी। ऐसे में डॉक्‍टर्स को लगा अब ठीक होने की कोई उम्‍मीद नहीं है।

जैनी ने बताया कि उसके पति ने लाइफ सपोर्ट सिस्‍टम बंद करने से इंकार कर दिया था। हालांकि उसने अपने पति से पहले कहा था कि अगर उसकी बीमारी लाइलाज हो जाए और वो ठीक न हो सके, तो वो मरना चाहेगी।

गुलियन बेरी  सिंड्रोम की वजह से वो सुन तो सकती थी, लेकिन कुछ कर नहीं सकती थी। इसके बावजूद जब सुना कि डॉक्‍टर उसके पति से लाइफ सपोर्ट सिस्‍टम हटाने की बात कर रहे हैं और उसके पति ने इससे इंकार कर दिया है, तो वो उठ बैठी। जैनी की हालत में अब धीरे-धीरे सुधार हो रहा है। इस सिंड्रोम से पीड़ित करीब 80 फीसदी लोग 3 साल में पूरी तरह ठीक हो जाते हैं।

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